रेशम उद्योग कैसे किया जाता है इसके बारे में जानकारी

रेशम एक मूल्यवान वस्त्र है, जिसका सौन्दर्य पहनने वाला ही महसूस कर सकता है। यह अहसास ही रेशम के मूल्यवान होने का कारण भी है। रेशम और उससे बनने वाले उत्पाद अपने ऊँचे मूल्य के कारण अपने निर्मंताओं के लिए आय के अच्छे स्रोत होते हैं। एक लाभदायक रोजगार है रेशम उत्पाद के लिए ऐसी सिंचित भूमि होना आवश्यक है जिस पर शहतूत के पौधों को रोपती किया जा सके। एक उद्यमी के लिए लगभग डेढ़ एकड़ रकबा काफी है।

 

जानकारी :

शहतूत के पौधों की खासियत यही है कि इन्हें कहीं भी लगाया जा सकता है। इन पौधों को न तो किसी विशेष किस्म की मिट्टी की जरूरत होती है न ही कुछ विशेष आबोहवा की। इस पेड़ की पत्तियाँ रेशम के कीड़ों का मुख्य भोजन होती है। शहतूत में यह पत्तियाँ एक निश्चित अनुपात में निरंतर उगती रहती है अत: कीड़ों के लिए भोजन की कोई समस्या नहीं रहती है।

रेशम उत्पादन-औसतन 1000 कि. ग्रा. फ्रेश कोकून सुखाने पर 400 कि. ग्रा. के लगभग रह जाता है जिसमें से 385 कि. ग्रा. में प्यूपा 230 कि. ग्रा. रहता है और शेष 155 कि. ग्रा. शेल रहता है। इस 230 कि.ग्रा. प्यूपा में से लगभग 120 कि. ग्रा. कच्चा रेशम तथा 35 कि.ग्रा. सिल्क वेस्ट प्राप्त होता है। इस कच्चे रेशम से रेशम को चरखे/तकली द्वारा रोल किया जाता है जिसे रीलिंग कहते हैं।

रेशम तभी बिक्री योग्य होता है, जब उसको कपड़े के रूप में बुन लिया जाए। बुनाई हेतु कई साधन आजकल प्रचलन में है फिर भी हथकरघा पर बने हुए रेशम का अच्छा बाजार मूल्य मिलता है। कुछ हथकरघा जैसे सेवाग्राम करघा, नेपाली करघा, चितरंजन करघा आदि प्रमुखता से उपयोग किये जाते हैं। हथकरघा आदि के लिए उद्यमी अपने क्षेत्र के प्रबंधक खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड से परामर्श ले सकते हैं।

 

शुरूवात :

कच्चा रेशम बनाने के लिए रेशम के कीटों का पालन सेरीकल्चर या रेशम कीट पालन कहलाता है। रेशम उत्पादन का आशय बड़ी मात्रा में रेशम प्राप्त करने के लिए रेशम उत्पादक जीवों का पालन करना होता है। इसने अब एक उद्योग का रूप ले लिया है।  यह कृषि पर आधारित एक कुटीर उद्योग है। इसे बहुत कम कीमत पर ग्रामीण क्षेत्र में ही लगाया जा सकता है। कृषि कार्यों और अन्य घरेलू कार्यों के साथ इसे अपनाया जा सकता है। श्रम जनित होने के कारण इसमें विभिन्न स्तर पर रोजगार का सृजन भी होता है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह उद्योग पर्यावरण के लिए मित्रवत है।

 

रेशम कीटाण्डों का सेवन (इन्क्यूबेशन) :

रोगरहित रेशम कीटाण्डों को कीटपालन गृह में ट्रे में एक पतली तह के रूप में रखा जाता है। गृह में तापमान 25 डिग्री सेण्टीग्रेट एवं आर्द्रता लगभग 80-90 सुनिश्चित की जाती है। आर्द्रता सुनिश्चित करते हुए पैराफिन पेपर एवं फोम पैड का प्रयोग किया जाता है। कीटाण्डों में जब ‘पिन हेड स्टेज’ आती है, तो कीटाण्डों को अंधेरे में रखा जाता है। प्रस्फुटन की सम्भावित तिथि को प्रात: काल में कीटाण्डों को प्रकाश में रखा जाता है। जिसमें लगभग 90-95 % कीटाण्डों में प्रस्फुटन हो जाता है।

 

सफाई :

रेशम कीटपालन के समय कीटपालन बेड की सफाई आवश्यक है, क्योंकि उसमें रेशम, कीटों का मल एवं पुरानी बची हुई पत्तियाँ होती हैं। प्रथम अवस्था में मोल्ट से एक दिन पूर्व मात्र एक सफाई की जाती है। द्वितीय अवस्था में दो सफाई की जाती हैं। पहली मोल्ट खुलने के बाद फीडिंग देने के बाद एवं दूसरी द्वितीय मोल्ट से एक दिन पूर्व सफाई की जाती है। द्वितीय अवस्था में दो सफाई की जाती हैं। 0.5 x 0.5 आकार वाली नेट को कीटपालन बेड के ऊपर डालते हुए ताजी शहतूत की पत्तियाँ नेट के ऊपर डाली जाती हैं। रेशम कीट नेट के छिद्रों से रेंगकर ताजी पत्तियों के ऊपर चढ़ जाते हैं। करीब आधा घण्टे बाद नेट को कीटों सहित दूसरे कीटपालन ट्रे में स्थानांतरित कर दिया जाता है एवं बची हुई पत्तियों एवं रेशम कीट के मल (एक्सक्रीटा) को खेत मे गड्ढा बनाकर दबा दिया जाता है।

 

रेशम की किस्में :

व्यावसायिक महत्व की कुल 5 रेशम किस्में होती हैं जो रेशमकीट की विभिन्न प्रजातियों से प्राप्त होती हैं तथा जो विभिन्न खाद्य पौधों पर पलते हैं । किस्में निम्न प्रकार की हैं :

 

  • शहतूत
  • ओक तसर एवं उष्णकटिबंधीय तसर
  • मूंगा
  • एरी

 

फायदे :

  • रोज़गार की पर्याप्त क्षमता
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार
  • कम समय में अधिक आय
  • महिलाओं के अनुकूल व्यवसाय
  • समाज के कमज़ोर वर्ग के लिए आदर्श कार्यक्रम
  • पारि – अनुकूल कार्यकलाप
  • समानता संबंधी मुद्दों की पूर्ति

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