डेयरी उद्योग

 

पशुपालन हमारे देश में ग्रामीणों के लिए सिर्फ शौक ही नहीं, बल्कि आमदनी का जरिया भी रहा है, लेकिन सही जानकारी के अभाव में अकसर लोग पशुपालन का पूरा फायदा नहीं उठा पाते. इस काम से संबंधित थोड़ा-सा ज्ञान और सही दिशा में की गयी प्लानिंग आपको बेहतरीन मुनाफा कमाने का रास्ता दिखा सकती है. डेयरी उद्योग में दुधारू पशुओं को पाला जाता है. इस उद्योग के तहत भारत में गाय और भैंस  पालन को ज्यादा महत्व दिया जाता है, क्योंकि इनकी अपेक्षा बकरी कम दूध देती है. इस उद्योग में मुनाफे की संभावना को बढ़ाने के लिए पाली जानेवाली गायों और भैंसों की नस्ल, उनकी देखभाल व रख-रखाव की बारीकियों को समझना पड़ता है.

 

शैक्षिक योग्यता :

आप चाहें तो डेयरी उद्योग की बारीकियों को समझने के लिए प्रशिक्षण भी ले सकते हैं. ऐसे कई संस्थान हैं, जो डेयरी उद्योग का प्रशिक्षण देते हैं. प्रशिक्षण लेने के लिए कोई निश्चित शैक्षिक योग्यता या आयु सीमा निर्धारित नहीं है. डेयरी उद्योग को स्वरोजगार के रूप में अपनाने की ख्वाहिश रखनेवाले इन संस्थानों में दाखिला ले सकते हैं. हां, मगर डेयरी प्रोडक्शन के पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्स में प्रवेश लेने के लिए उम्मीदवार का 60 प्रतिशत अंकों के साथ बीएससी पास होना आवश्यक है.

 

गाय पालन की तैयारी :

गाय की नस्ल (breed) का चुनाव :-

जब कभी भी आप dairy farming का business करने को सोंचे तो आपके लिए ये जानना बहुत जरुरी है की कौन सी नस्ल की गाय सबसे ज्यादा दूध देती है. किस नस्ल की गाय का बछड़ा दूध का उत्पादन करने के जल्दी बढ़ता है या फिर पुरुष बछड़ों को आप कितना बेच सकते है इन सभी बातों का अच्छे से पता कर लेना चाहिए . गाय को अपने शहर के जलवायु के अनुसार हीं खरीदना चाहिए ताकि वे आपके शहर की जलवायु को बर्दास्त कर सके इसलिए बेहतर होगा की गाय आप अपने शहर से हीं ख़रीदे. आपके लिए ये जानना भी बेहत जरुरी है की किस नस्ल के दूध के लिए स्थानीय मांग ज्यादा है . निचे हम आपको बताएँगे की कौन सी नस्ल की गाय ज्यादा दूध उत्पादन करती है :-

 

a)

जर्सी गाय – ये गाय पिले-लाल रंग में पाई जाती है और  इनमे milk production की क्षमता भी बहुत अच्छी होती है .

साहीवाल गाय – ये भी एक देशी गाय होती है और ये गाय प्रति दिन 10 से 13 liter दूध देती है. सबसे अच्छी बात यह है की इसे पालना आसन है और बीमारी भी कम होती है .

गिर गाय – ये गायें दूध उत्पादन के लिए बहुत हीं अच्छी होती है ये प्रति दिन लगभग 5 से 7 liter दूध देती है . ये गाय नियत time पर बछड़े को भी जन्म देती हैं.

 

b)

लाल सिंधी गाय – दूध उत्पादन के लिए ये गाय भी बहुत अच्छी मानी जाती है . ये कम खुराक में भी अपने शरीर को अच्छे से रख लेती है. इसकी दूध की मांग काफी अच्छी है .

थरपारकर गाय – इस गाय की खुराक बहुत हीं कम होने के बावजूद  भी ये milk production में अच्छी होती है . यह बिलकुल देसी गाय है, इसे पालना तो आसन है ही साथ ही साथ रख रखाव भी काफी कम है .

राठ गाय – ये गाय भी कम खाती है और दूध ज्यादा देती हैं.

देवनी गाय – ये भी दूध उत्पादन के लिए अच्छी होती है.

 

लघु डेरी फार्म :

उन्नत नस्ल की 2 गायों के साथ लघु डेरी फार्म शुरू किया जा सकता है. इस पर कुल खर्च 1 लाख 10 हजार रुपए होता है, जिस में 65 फीसदी यानी 70 हजार 850 रुपए बैंक से कर्ज मिल सकता है और लागत का 25 फीसदी यानी 27 हजार 250 रुपए गव्य विकास निदेशालय की ओर से मुहैया कराए जाते हैं. फार्म शुरू करने वाले को अपनी जेब से करीब 11 हजार रुपए लगाने होंगे. चारा, दाना, पशु बीमा और इलाज पर हर साल करीब 65 हजार रुपए खर्च होते हैं और बैंक कर्ज चुकाने में हर साल 20 हजार रुपए खर्च होंगे. दूध और बछियाबछड़े बेच कर सवा लाख रुपए तक की कमाई हो सकती है. इस में चारा और लोन चुकाने का खर्च घटा दिया जाए तो सालाना 42 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा हो जाता है.

मिनी डेरी फार्म : उन्नत किस्म की 5 गायों से मिनी डेरी फार्म लगाया जा सकता है. इस में करीब 2 लाख 70 हजार रुपए की लागत आती है, जिस में 65 फीसदी यानी 1 लाख 75 हजार रुपए बैंक से कर्ज और 25 फीसदी यानी 67 हजार रुपए विभाग से अनुदान के रूप में आसानी से हासिल किए जा सकते हैं. डेरी फार्म लगाने वाले को कुल लागत का 10 फीसदी यानी करीब 27 हजार रुपए का जुगाड़ करना पड़ेगा. मिनी डेरी फार्म से हर साल करीब 90 हजार रुपए की शुद्ध कमाई की जा सकती है. गायों को खिलाने, इलाज और बीमा वगैरह पर सालाना 1 लाख 90 हजार रुपए और बैंक का कर्ज चुकाने में करीब 46 हजार रुपए खर्च हो जाएंगे.

 

मिनी डेयरी योजना (पांच दुधारू मवेशी के लिए) :

सरकार की ओर से मिनी डेयरी योजना चलायी जा रही है जिसके लिए दुग्ध-उत्पादन करने वालों को अनुदान दिया जाता है. प्रगतिशील किसानों और शिक्षित युवा बेरोजगार को इस योजना के तहत पांच दुधारू मवेशी उपलब्ध कराया जाता है. ये मवेशी गाय अथवा भैंस हो सकते हैं. इस योजना के तहत 50 प्रतिशत अनुदान एवं 50 प्रतिशत बैंक लोन पर पांच दुधारू मवेशी दिया जाता है. दो चरणों में लाभुक को मवेशी दिया जाता है. पहले चरण में तीन मवेशी और छह माह के बाद दो मवेशी की खरीद के लिए पैसा बैंक के माध्यम से दिया जाता है. योजना लागत में मवेशी की खरीद के लिए 1,75,000 रुपये, शेड निर्माण के लिए 45,000 रुपये तथा तीन वर्षों के लिए मवेशियों के बीमा प्रीमियम के लिए 20,000 रुपये लाभुक को दिये जाते हैं.

 

दूध की खपत :

नेशनल सर्वे सैंपल ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) की 2011-12 के लिए जारी की गई ताजा रिपोर्ट भी दूध की बढ़ती खपत की ओर इशारा करती है. इसके मुताबिक, 2004-05 में किसी परिवार के फूड बजट में दूध का हिस्सा घट रहा था लेकिन 2009-10 से लेकर 2011-12 के बीच यह एकदम से बढ़ गया. ग्रामीण इलाकों में दूध से बने उत्पादों पर खर्च करने में 105 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई जबकि शहरी इलाकों में यह 90 फीसदी पर है.

यही नहीं, 2004-05 की अपेक्षा 2011-12 में प्रति व्यक्ति दूध की खपत में ग्रामीण इलाकों में प्रति माह 470 मिलीलीटर का इजाफा हुआ है जबकि शहरी इलाकों में यह बढ़ोतरी 315 मिलीलीटर है. निर्यात के मामले में भी हमारा प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है. एग्रीकल्चरल ऐंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (एपीईडीए) के मुताबिक, 2013-14 में भारत ने 3,318 करोड़ रु. के 1,59,228.52 मीट्रिक टन डेयरी उत्पादों का निर्यात किया है. यह निर्यात प्रमुख रूप से पड़ोस के बांग्लादेश और पाकिस्तान के अलावा मिस्र, यूएई, अल्जीरिया, यमन आदि को किया जाता है.

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