खेती जवार की – महत्वपूर्ण जानकारी

ज्वार एक प्रमुख फसल है। ज्वार कम वर्षा वाले क्षेत्र में अनाज तथा चारा दोनो के लिए बोई जाती हैं। ज्वार जानवरों का महत्वपूर्ण एवं पोष्टिक चारा हैं। भारत में यह फसल लगभग सवा चार करोड़ एकड़ भूमि में बोई जाती है। यह खरीफ की मुख्य फसलों में है। यह एक प्रकार की घास है जिसकी बाली के दाने मोटे अनाजों में गिने जाते हैं।

ज्वार (सोरघम बाईकलर)  ग्रेमिनी कुल की महत्वपूर्ण फसल है, जिसे अंग्रेजी में सोरघम, तेलगु में जोन्ना, मराठी में ज्वारी तथा कन्नड़ में जोल कहा जाता है। पारंपरिक रूप से खाद्य तथा चारा की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु इसकी खेती की जाती है, लेकिन अब यह संभावित जैव-ऊर्जा फसल के रूप में भी उभर रही है । खाद्यान्न फसलों में क्षेत्रफल की दृष्टि से ज्वार का  भारत में तृतीय स्थान है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में ज्वार सबसे लोकप्रिय फसल हैं। ज्वार की खेती उत्तरी भारत में खरीफ के मौसम में और दक्षिणी भारत में खरीफ एंव रबी दोनों मौसमों में की जाती है। ज्वार की खेती अनाज व चारे के लिये की जाती है। ज्वार के दाने में क्रमशः 10.4, 1.9, 1.6 व 72 प्रतिशत प्रोटीन, वसा, खनिज पदार्थ एंव कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। ज्वार की प्रोटीन में लाइसीन अमीनो अम्ल की मात्रा 1.4 से 2.4 प्रतिशत तक पाई जाती है जो पौष्टिकता की दृष्टि से काफी कम है। इसके दाने में ल्यूसीन अमीनो अम्ल की अधिकता होने के कारण ज्वार खाने वाले लोगों में पैलाग्रा नामक रोग का प्रकोप हो सकता है। ज्वार की विश्¨ष किस्म से स्टार्च तैयार किया जाता है । इसके दानो  से शराब भी तैयार की जाती है । अलकोहल उपलब्ध कराने का भी एक उत्कृष्ट साधन है । हरे चारे के अतिरिक्त ज्वार से साइल्¨ज भी तैयार किया जाता है जिसे पशु बहुत ही चाव से खाते है । ज्वार के पौधों की छोटी  अवस्था में हाइड्रोसायनिक अम्ल नामक जहरीला पदार्थ उत्पन्न होता है। अतः प्रारंभिक अवस्था में इसका चारा पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए। ज्वार की फसल कम वर्षा में भी अच्छी उपज दे सकती है। तथा कुछ समय के लिये पानी भरा रहने पर भी सहन कर लेती है।

भारत में  ज्वार की खेती-वर्तमान परिद्रश्य
खाद्य, चारा और अब जैव-उर्जा के रूप में इसके बहु-उपयोग के बावजूद, हमारे देश में ज्वार का रकबा 1 9 7 0 में जहाँ 1 8 .6 1 मिलियन हेक्टेयर हुआ करता था, वर्ष 2 0 0 8 की स्थिति में घट कर 7.76 मिलियन हे.रह जाना चिंता का विषय में है. सिचाई सुबिधाओ में विस्तार तथा बाजार मूल्य में गिरावट की वजह से अन्य फसलों जैसे धान, गन्ना, कपास,सोयाबीन,मक्का आदि फसले अधिक आकर्षक और  लाभकारी होने के कारण  ज्वार इन फसलों से प्रतिस्पर्धा में नीचे रह गया। दूसरी तरफ वैज्ञानिक शोध और विकास की वजह से ज्वार की औषत उपज 5 2 2 किलोग्राम से बढकर 9 8 1 होना, इस फसल के उज्जवल भविष्य का सूचक है। भारत में लगभग सभी राज्यों में ज्वार की खेती की जाती है। परन्तु कम वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी खेती ज्यादा प्रचलित है। भारत में महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश , राजस्थान तथा गुजरात ज्वार पैदा करने वाले प्रमुख प्रदेश है। महाराष्ट्र ज्वार के उत्पादन में लगभग 51.68 प्रतिशत भागीदार है। भारत में वर्ष 2007-08 के आकड़ों के अनुसार ज्वार का कुल क्षेत्रफल 7.76 मिलियन हे. जिससे 10.21 क्विंटल  प्रति हे. की दर से 7.93 मिलियन टन उत्पादन प्राप्त किया गया । मध्य प्रदेश में ज्वार की खेती लगभग 0.53 मिलियन हे. में प्रचलित है जिससे 0.47 मिलियन  टन उत्पादन होता है तथा 14.20  क्विंटल  प्रति हे. औसत उपज आती है। छत्तीसगढ़  में ज्वार की खेती सीमित क्षेत्र (7.86 हजार हे.) में होती है  जिससे 1099 किग्रा. प्रति. हे. की दर से 8.64 हजार टन उत्पादन लिया जाता है । राष्ट्रीय औसत उपज से छत्तीसगढ़ में ज्वार की औसत उपज अधिक होना इस बात का प्रमाण हे की प्रदेश की भूमि और जलवायु इसकी खेती के लिए अनुकूल है। जैव-ईधन के रूप में

राज्य सरकार  रतनजोत (जेट्रोफा) की खेती को बढावा दे रही है जिसके उत्साहवर्धक परिणाम अभी तक देखने को नहीं मिल रहे है। इस परियोजना पर सरकार  भारीभरकम धन राशी व्यय क्र चुकी है और नतीजा सिफर

रहा है. रतनजोत की जगह यदि जुआर की खेती को बढावा दिया जाए तो न केवल दाना-चारा का उत्पादन बढेगा वल्कि जैव-उर्जा (बायोडीजल ) उत्पादन के लिए भी बेहतर विकल्प साबित हो सकती है।

उपयुक्त जलवायु

ज्वार उष्ण (गरम) जलवायु की फसल है। इसकी खेती समुद्र तल से लगभग 1000 मी. की ऊँचाई तक की जा सकती है। शीघ्र तैयार होने वाली किस्मों को ठंडे प्रदेशों में गर्मी की ऋतु में उगाया जा सकता है। उत्तरी भारत में ज्वार की मुख्य फसल खरीफ में ली जाती है जबकि दक्षिणी भारत में यह रबी में उगाई जाती है ।बीज अंकुरण के लिए न्यूनतम तापक्रम 7-10 डि. से. होना चाहिए। पौधों की बढ़वार के लिए 26-30 डि.से. तापक्रम अनुकूल माना गया है। इसकी खेती के लिए 60-100 सेमी. वार्षिक वर्षा उपयुक्त ह¨ती है। ज्वार की फसल में सूखा सहन करने की अधिक क्षमता होती है क्योंकि इसकी जड़े भूमिमें अधिक गहराई तक जाकर जल अवशोषित कर लेती है । इसके अलावा प्रारंभिक अवस्था में ज्वार के पौधों में जड़ों का विकास तने की अपेक्षा अधिक होता है।जिससे पत्तियों की सतह से जल का कुल वाष्पन भी कम होता है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में परागण के समय वर्षा अधिक होने से परागकण बह जाने की सम्भावना रहती है जिससे इन क्षेत्रों में ज्वार की पैदावार कम आती है। यह एक अल्प प्रकाशपेक्षी पौधा है। ज्वार की अधिकांश किस्मों में फूल तभी आते हैं जबकि दिन अपेक्षाकृत छोटे होते है।

भूमि का चयन

ज्वार की फसल सभी प्रकार की मृदाओं यथा भारी और  हल्की मिट्टियां, जलोढ, लाल या पीली दुमट और  यहां तक कि रेतीली मिट्टियो में भी उगाई जाती है, परन्तु इसके  लिए उचित जल निकास वाली  भारी मिट्टियां (मटियार दोमट) सर्वोत्तम होती है। इसीलिए पश्चिमी, मध्य और  दक्षिण भारत की काली मिट्टियो  में इसकी खेती बहुत अच्छी होती है ।असिंचित अवस्था में अधिक जल धारण क्षमता वाली मृदाओं में ज्वार की पैदावार अधिक होती है। मध्य प्रदेश में भारी भूमि से लेकर पथरीले भूमि पर इसकी खेती की जाती हैं। छत्तीसगढ़ की भाटा-भर्री भूमिओ में इसकी खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है।  ज्वार की फसल 6.0 से 8.5  पी. एच. वाली मृदाओं में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है।

खेत की तैयारी

पिछली फसल के  कट जाने के बाद मिट्टी पलटने वाले हल से खेत में 15-20 सेमी. गहरी जुताई करनी चाहिए। इसके बाद 2-3 बार हैरो या 4-5 बार देशी हल चलाकर मिट्टी को भुरभुरा कर लेना चाहिए। बोआई से पूर्व पाटा चलाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। मालवा व निमाड़ में ट्रैक्टर से चलने वाले कल्टीवेटर व बखर से जुताई करके जमीन को अच्छी तरह से भुरभुरी बनाते है। ग्वालियर संभाग में देशी हल या ट्रेक्टर से चलने वाले कल्टीवेटर से जमीन को भुरभुरी बनाकर पाटा से खेत समतल कर बोआई करते हैं।

किस्मों का चुनाव

ज्वार से अच्छी  उपज के लिए  उन्नतशील  किस्मों का  शुद्ध बीज ही बोना चाहिए। किस्म का चयन बोआई का समय और क्षेत्र  अनुकूलता के आधार पर करना चाहिए। बीज प्रमाणित संस्थाओं का ही बोये या उन्नत जातियों का स्वयं का बनाया हुआ बीज प्रयोग करें। ज्वार में दो प्रकार की किस्मों के बीज उपलब्ध हैं-संकर एंव उन्नत किस्में। संकर किस्म की बोआई के  लिए प्रतिवर्ष नया प्रमाणित बीज ही प्रयोग में लाना चाहिए। उन्नत जातियों का बीज प्रतिवर्ष बदलना नही पड़ता।

ज्वार की प्रमुख संकर किस्मों की विशेषताएँ

1. सी. एस. एच.-5: यह किस्म 105-110 दिनों की अवधि में पककर तैयार हो जाती है। इसके दानों का उत्पादन 33-35 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर तथा 90-95 क्विंटल  कडवी का उत्पादन होता है। इसके पौधे 175 सेमी. के लगभग ऊँचे होते हैं। इसका भुट्टा लम्बा तथा अर्धबंधा होता हैं, दानों का आकार छोटा होता है। यह जाति सम्पूर्ण मध्य प्रदेश के लिये उपयुक्त है।

2. सी. एस. एच -6: यह किस्म 100-105 दिनों की अवधि में पककर तैयार हो जाती है। इसके दानों का उत्पादन 32-34 क्विंटल  तथा कड़वी 80-82 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त किया जा सकता है। इसके पौधे 160-170 सेमी. के लगभग ऊँचे होते हैं। दानों का आकार छोटा होता है। मिश्रित फसल पद्धति के लिये सबसे उपयुक्त किस्म है। यह सूखा अवरोधी किस्म है।

3. सी. एस. एच -9: यह किस्म 105-110 दिनों की अवधि में पककर तैयार हो जाती है। दानों का उत्पादन 36-40 क्विंटल  तथा कड़वी 95-100 क्विंटल  प्रति हे. तक प्राप्त होती है। इसके पौधे 182 सेमी. के लगभग ऊँचे होते हैं। इसका दाना आकार में थोड़ा बड़ा मोतिया रंग का चमकदार होता है। यह सूखा अवरोधी किस्म है।

4. सी. एस. एच -14: यह किस्म 95-100 दिनों की अवधि में पक कर तैयार हो जाती हैं। इसके दानों का उत्पादन 36 से 40  क्विंटल  प्रति हेक्टेयर व कड़वी का 85-90  क्विंटल  उत्पादन होता है। इसके पौधे 181 सेमी. के लगभग ऊँचे होते हैं। यह किस्म कम गहरी भूमि के लिये उपयुक्त है।

5. सी. एस. एच -18: इस किस्म के पकने की अवधि 110 दिन हैं तथा दोनों का उत्पादन 34 हसे 44  क्विंटल/  हेक्टेयर तथा कड़वी का उत्पादन 120 से 130  क्विंटल  है।

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