एलोविरा की खेती

परिचय:-

एलोविरा की उत्त्पति का स्थान उत्तरी अफ्रीका माना जाता है।इसे कई नामो से जाना जाता है। जेसे घृतकुमारी, ग्वारपाटा, अग्रेजी में एलॉय नाम से भी जाना जाता है। ग्वारपाटा के पोधे की उचाई 60- 90 से.मी.तक होती है। पत्तो की लम्बाई 30-45 सेमी. तक होती है। पत्ते 4.5सेमी से 7.5सेमी तक होते है। जड से उपर सतह के साथ ही पत्ते निकलने लगते है। पत्तो का रंग हरा होता है। और पत्तो की किनारों पर छोटे छोटे काटे जेसे होते है। अलग अलग रोगों के हिसाब से इसकी कई सारी प्रजातिया है।

एलोवीरा का उपयोग:-

Aloevera में कई सारे औषधीय गुण होते है।इसलिए इसका उपयोग आयुवेदिक में बड़े पैमाने से होता आ रहा है। आज के दोर में कई सारी नेशनल और इंटर नेशनल कंपनिया इसका उपयोग चिकत्सा के साथ साथ सोंदर्य प्रसाधन के जेसे फेसवास क्रीम शेम्पू  दन्त पेस्ट अन्य कई सारे product में इसका इतेमाल होता है।इसलिए इसकी माग बडने लगी है। यह पोधा गमले में भी अच्छी तरह से चलता है। मेने भी इसे अपने घर पर लगा रखा है। क्यों की यह जलने पर इसके पत्तो में से गुद्दा और रस लगाने से काफी ज्यदा relif मिलती है।कई सारे लोग इसे मकानों की छत और gardan में शोकियाना तोर पर भी लगाते है। इसकी बढती माग की वजह से इसकी खेती व्यवसायक रूप में शुरू हो गयी है।

एलोवीरा की खेती के लिए khet की तेयारी:-
वेसे एलोविरा के पोधे किसी भी प्रकार की उपजाऊ अनुपजाऊ मिटटी में आसानी से उग जाते है।बस आपको बस एक बात का ध्यान रखना है की पोधा अधिक जल भराव और पाला पड़ने वाली जगह पर नही लगाना है।सबसे पहले खेत की 2 बार अच्छे से जुताई कर उसमे प्रति हेक्टर 10 से 20 टन के बिच में अच्छी पकी हुई गोबर की खाद डाले साथ में 120 किलोग्राम यूरिया+150किलोग्राम फास्फोरस+30किलोग्राम पोटाश इनको खेत में समान रूप से बिखेर देवे फिर एक बार हलकी जुताई करा के पाटा लगा कर मिटटी को समतल बना ले। फिर खेत में 50×50 सेमी. की दुरी पर उठी हुई क्यारी बना ले।
पोधो की रोपाई एवं रखरखाव:- 
पोधो की रोपाई किसी भी समय की जा सकती है। लेकिन अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए जून जुलाई और फरवरी से मार्च के बिच कर सकते है। एलोवीरा की रोपाई प्रकंदों से होती है इसलिए उनकी लम्बाई 10 से 15 सेमी के होने चाहिए। अच्छी उपज के लिए अनुशासित किस्मे  सिम-सितल एल 1,2,5 और 49 है।जिसमे जेल की मात्रा ज्यदा पाई जाती है। प्रकंदों की दुरी 50×50 रख के बिच में दुरी 30सेमी की रख कर रोपाई करनी चाहिए।

घर्तकुमारी की सिचाई:-

सालभर में इसे मात्र 4 या 5 बार सिचाई की आवश्यकता होती है। सिचाई के लिए स्प्रिकलर और ड्रीप प्रणाली अच्छी रहती है। इससे इसकी उपज में बढोतरी होती है।गर्मी के दिनों में  25 दिनों के अंतराल में सिचाई करनी चाहिए।
निदाई गुड़ाई:- 
खतपतवार की स्थति देख कर निदाई गुड़ाई आवश्यक हो जाती है वर्षभर में 3 या 4 निदाई करनी चाहिये निदाई के बाद पोधो की जड़ो में मिट्ठी चढ़ानी चाहिए ताकि पोधे गिरे नही।
रोग और किट नियन्त्रण:-
वेसे तो इस फसल पर कोई विशेष किट और रोगों का प्रभाव नही होता है।लेकिन कही कही तनो के सड़ने और पत्तो पर दब्बो वाली बीमारिया का असर देखा गया है।जो एक फफूंद जनक रोग होता है उसके उपचार के लिए मेंन्कोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से छिडकाव करना चाहिए।
एलोविरा की कटाई और उत्पादन:-
यह फसल एक वर्ष बाद काटने योग्य हो जाती है। कटाई के दोरान पोधो की सबसे पहले निचली ठोस 3 या 4 पत्तो की कटाई करे उसके उपरांत लगभग एक महीने के बाद उस से उपर वाली पत्तियों की कटाई करनी चाहिए कभी भी उपर की नई नाजुक पत्तियों की कटाई नही करे। कटे हुए पत्तो में फिर से नई पत्तिया बननी शुरू हो जाती है।प्रति हेक्टर 50 से 60 टन ताजी पत्तिया प्रतिवर्ष मिल जाती है। दुसरे वर्ष में 15 से 20 प्रतिशत वर्धी होती है। बाज़ार में इन पत्तियों की बाजार में अनुमानित कीमत 3 से 6 रूपये किलो होती है। एक स्वस्थ पोधे की पत्तियो का वजन 3 से 5 किलो तक हो जाता है।

कटाई के बाद प्रबंधन और प्रसस्करण:-

स्वस्थ पत्तियों की कटाई के बाद साफ़ पानी से धो कर पत्तियों के निचले हिस्से में ब्लेड या चाकू से कट लगा कर थोड़े समय के लिए छोड़ देते है। जिसमे से पीले रंग का गाडा चिपचिपा प्रदार्थ-रस (जेल) निकलता है उसे एक पात्र में इक्कठा कर के वाष्पीकरण विधि से इस रस को सुखा लिया जाता है।इस सूखे हुए रस को जातिगत और अलग अलग विधि से तेयार करने के बाद अलग अलग नामों से जाना जाता है। जेसे सकोत्रा,केप,जंजीवर,एलोज,अदनी आदि ।
एलोविरा की खेती करने के क्या फ़ायदा है:-
*इसकी खेती किसी भी जमींन पर आसानी से की जा सकती है।
*कम खर्च और और सस्ती खेती। गरीबी किसान को फ़ायदा।
*सिचाई और दवाई का कम खर्च।
*बंजर और अनूउपयोगी जमीन का उपयोग हो जाता है।
*इसे कोई भी पशु नही खाता है इसे खेत की मेड पर चारो तरफ लगाने से दूसरी फसल की भी सुरक्षा हो जाती है
*एक बार लगाने के बाद 5 सालो तक आसानी से फसल ले सकते है।
*अन्य फसलो की तुलना में मिटटी का हास कम होता है।

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